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अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले
पाठ की आसान व्याख्या (Easy Chapter Explanation)
यह पाठ हमें याद दिलाता है कि कैसे मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति और अन्य मूक जीवों को नुकसान पहुँचाया है और कैसे आज का इंसान दूसरों के दुखों के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील हो गया है। लेखक ने इस बात को समझाने के लिए कुछ बहुत ही सुंदर ऐतिहासिक और व्यक्तिगत उदाहरण दिए हैं:
- सुलैमान (सोलोमेन) की करुणा: ईसा से 1025 वर्ष पूर्व सुलैमान नामक एक राजा थे, जो केवल इंसानों के ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों के भी राजा थे और उनकी भाषा जानते थे। एक बार उनकी सेना को आते देख चींटियाँ डरकर अपने बिलों की ओर भागने लगीं। सुलैमान ने उनकी बात सुनी और उन्हें ढाँढस बंधाते हुए कहा, "घबराओ नहीं, ईश्वर ने मुझे सबका रखवाला बनाया है। मैं किसी के लिए मुसीबत नहीं, बल्कि सबके लिए प्यार हूँ।"
- शेख अयाज़ के पिता की संवेदनशीलता: सिंधी भाषा के महान कवि शेख अयाज़ के पिता जब एक दिन कुएँ से नहाकर लौटे और भोजन करने बैठे, तो उनकी बांह पर एक काला च्योंटा (चींटा) रेंग रहा था। वे तुरंत भोजन छोड़कर खड़े हो गए। जब माँ ने पूछा कि क्या भोजन पसंद नहीं आया, तो उन्होंने कहा, "मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है। मैं इस बेघर जीव को वापस कुएँ पर उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ।"
- पैगंबर नूह का रोना: बाइबल और अन्य ग्रंथों में नूह (असली नाम लश्कर) नामक पैगंबर का ज़िक्र है, जिन्हें 'नूह' (रोने वाले) की उपाधि मिली क्योंकि वे जीवनभर रोते रहे। एक बार उनके सामने से एक घायल कुत्ता गुज़रा तो उन्होंने उसे दुत्कारते हुए 'गंदा' कह दिया। कुत्ते ने जवाब दिया, "न मैं अपनी मर्ज़ी से कुत्ता हूँ, न तुम अपनी पसंद से इंसान हो। हम दोनों का बनाने वाला तो वही एक ईश्वर है।" यह बात नूह के दिल को छू गई और वे पश्चाताप में पूरी उम्र रोते रहे।
- बढ़ती आबादी और प्रकृति का असंतुलन: पहले पूरा संसार एक परिवार की तरह था और लोग बड़े-बड़े आँगनों में मिल-जुलकर रहते थे। लेकिन बढ़ती आबादी ने जंगलों को काट दिया, समुद्र को पीछे धकेलना शुरू कर दिया और पक्षियों को बेघर कर दिया। इसी प्राकृतिक असंतुलन का नतीजा है—भीषण गर्मी, बेवक्त की बरसातों का होना, भूकंप (ज़लज़ले), बाढ़ और नए-नए रोग।
- समुद्र का गुस्सा: मुंबई में बिल्डरों द्वारा लगातार समुद्र की ज़मीन हथियाने के कारण समुद्र सिकुड़ता चला गया। जब उसके पास खड़े रहने की भी जगह नहीं बची, तो उसे गुस्सा आ गया। एक रात उसने अपनी लहरों पर तैरते तीन बड़े जहाजों को बच्चों की गेंद की तरह तीन अलग-अलग दिशाओं (वर्ली, बांद्रा और गेट-वे-ऑफ़ इंडिया) में फेंक दिया, जो फिर कभी चलने के काबिल नहीं रहे।
- लेखक की माँ का जीव-प्रेम: लेखक की माँ हमेशा कहती थीं कि शाम के समय पेड़ों से पत्ते मत तोड़ो, वे रोएंगे; दीया-बत्ती के समय फूलों को मत तोड़ो, वे बद्दुआ देंगे। जब लेखक के ग्वालियर वाले घर में बिल्ली से बचाने की कोशिश में कबूतर का एक अंडा लेखक की माँ के हाथ से गिरकर टूट गया, तो माँ को बहुत दुख हुआ। उन्होंने इस पाप का प्रायश्चित करने और खुदा से माफ़ी माँगने के लिए दिनभर रोज़ा रखा और नमाज़ पढ़कर रोती रहीं।
- आज का माहौल: आज ग्वालियर से मुंबई (वर्सोवा) तक की दूरी में दुनिया बहुत बदल चुकी है। जहाँ पहले जंगल और पक्षी थे, वहाँ अब इमारतें खड़ी हैं। लेखक के फ्लैट में जब कबूतरों ने घोंसला बनाया, तो उनके आने-जाने से परेशान होकर लेखक की पत्नी ने वहाँ जाली लगा दी और उनके बच्चों को दूसरी जगह रख दिया। अब वे दोनों कबूतर रातभर खिड़की के बाहर उदास बैठे रहते हैं, लेकिन आज उनका दुख बाँटने के लिए न तो सुलैमान हैं और न ही लेखक की माँ।
महत्वपूर्ण प्रश्न-अभ्यास और उनके उत्तर (Exercises with Answers)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
प्रश्न 1: बड़े-बड़े बिल्डर समुद्र को पीछे क्यों धकेल रहे थे?
- उत्तर: बड़े-बड़े बिल्डर समुद्र को पीछे धकेलकर उसकी ज़मीन को हथियाना चाहते थे ताकि वहाँ बड़ी-बड़ी इमारतें और नई बस्तियाँ बना सकें।
प्रश्न 2: लेखक का घर किस शहर में था?
- उत्तर: लेखक का पैतृक घर ग्वालियर शहर में था, और वर्तमान में वे मुंबई (बम्बई) के वर्सोवा इलाके में रहते हैं।
प्रश्न 3: जीवन कैसे घरों में सिमटने लगा है?
- उत्तर: पहले लोग बड़े-बड़े आँगनों और दालानों में मिल-जुलकर एक परिवार की तरह रहते थे। अब बढ़ती आबादी के कारण जीवन छोटे-छोटे डिब्बे जैसे फ्लैटों और घरों में सिमटने लगा है।
प्रश्न 4: कबूतर परेशानी में इधर-उधर क्यों फड़फड़ा रहे थे?
- उत्तर: बिल्ली द्वारा एक अंडा तोड़े जाने के बाद, जब लेखक की माँ ने दूसरे अंडे को बचाने के लिए स्टूल पर चढ़कर उसे हाथ में लिया, तो वह अंडा हाथ से फिसलकर टूट गया। अपने दोनों अंडों को फूटा देखकर कबूतर परेशानी में इधर-उधर फड़फड़ा रहे थे।
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
प्रश्न 5: अरब में लश्कर को 'नूह' के नाम से क्यों याद किया जाता है?
- उत्तर: अरब में लश्कर को 'नूह' के लकब (उपाधि) से इसलिए याद किया जाता है क्योंकि वे जीवनभर रोते रहे। इसका कारण यह था कि उन्होंने एक बार एक घायल कुत्ते को 'गंदा' कहकर दुत्कार दिया था। उस कुत्ते ने उन्हें सीख दी कि सभी जीवों का रचयिता एक ही ईश्वर है। अपनी इस संवेदनहीनता पर पछताते हुए वे पूरी उम्र रोते रहे।
प्रश्न 6: लेखक की माँ पेड़ों से पत्ते और फूल तोड़ने के लिए कब और क्यों मना करती थीं?
- उत्तर: लेखक की माँ सूरज ढलने (शाम) के समय पेड़ों से पत्ते तोड़ने के लिए मना करती थीं क्योंकि उनका मानना था कि इस समय पत्ते तोड़ने से पेड़ रोते हैं। वे दीया-बत्ती (शाम) के समय फूल तोड़ने से भी मना करती थीं क्योंकि फूल बद्दुआ देते हैं।
प्रश्न 7: प्रकृति में आए असंतुलन का क्या परिणाम हुआ?
- उत्तर: प्रकृति में आए असंतुलन के कारण मौसम का चक्र पूरी तरह बिगड़ गया है। अब गर्मी में अत्यधिक गर्मी पड़ती है, बेवक्त की बरसातें होती हैं, और भूकंप (ज़लज़ले), बाढ़ (सैलाब), तूफान व रोज़ नए-नए असाध्य रोग इंसानों को परेशान कर रहे हैं।
प्रश्न 8: शेख अयाज़ के पिता अपने बाजू पर काला च्योंटा रेंगता देख भोजन छोड़कर क्यों उठ खड़े हुए?
- उत्तर: शेख अयाज़ के पिता जब कुएँ से नहाकर लौटे, तो भोजन करते समय उनकी नज़र अपनी बाजू पर रेंगते एक काले च्योंटे पर पड़ी। उन्हें अहसास हुआ कि वे कुएँ से आते समय इस मूक जीव को उसके घर से बेघर कर लाए हैं। उस बेघर जीव को वापस कुएँ पर उसके घर पहुँचाने के लिए वे भोजन बीच में ही छोड़कर उठ खड़े हुए।